बर्मिंघम से भक्ति तक
10 फ़रवरी 1945 को इंग्लैंड के बर्मिंघम में जन्मे महाविष्णु स्वामी (तब अपने जन्म के नाम से जाने जाते थे) युद्ध के बाद के ब्रिटेन में बड़े हुए। कला के प्रति अपने लगाव के चलते उन्होंने बाथ एकेडमी ऑफ़ आर्ट से ललित कला में सम्मान सहित स्नातक किया। उनकी रचनात्मकता और गहरे अर्थ की खोज उन्हें 1960 और 1970 के दशक के आरंभ के परिवर्तनकारी वर्षों में लंदन के आरंभिक इस्कॉन आंदोलन तक ले आई।
1971 में लंदन के बरी प्लेस स्थित राधा-कृष्ण मंदिर में उन्होंने कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद से प्रत्यक्ष दीक्षा प्राप्त की। यहीं से कृष्णभावनामृत को समर्पित उनके जीवन का आरंभ हुआ। उन्होंने तुरंत पूर्णकालिक मंदिर-सेवा अपना ली और श्रील प्रभुपाद के मिशन की सेवा के लिए अपना कला-जीवन त्याग दिया।
श्रील प्रभुपाद के बारे में




