इस्कॉन के संस्थापकाचार्य · 1896–1977
श्रील प्रभुपाद
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद् ए.सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद, परम पूज्य महाविष्णु स्वामी महाराज के आध्यात्मिक गुरु।
उनहत्तर वर्ष की आयु में वे अपने गुरु महाराज के आदेश के सिवा लगभग कुछ भी साथ लिए बिना भारत से निकले। उसके बाद के ग्यारह वर्षों में उन्होंने इस्कॉन की स्थापना की, चौदह बार पृथ्वी की परिक्रमा की और विश्व को कृष्णभावनामृत पर अपने ग्रंथ दिए।
उनका जीवन पढ़ें
प्रणाम मंत्र
नम ॐ विष्णु-पादाय कृष्ण-प्रेष्ठाय भू-तले श्रीमते भक्तिवेदान्त-स्वामिन् इति नामिने
नमस्ते सारस्वते देवे गौर-वाणी-प्रचारिणे निर्विशेष-शून्यवादि-पाश्चात्य-देश-तारिणे
उनका जीवन
कलकत्ता से पूरे विश्व तक
1896कलकत्ता
कलकत्ता में बचपन
श्रील प्रभुपाद का जन्म 1 सितंबर 1896 को कलकत्ता के एक धर्मपरायण परिवार में अभय चरण डे के रूप में हुआ।
1922कलकत्ता
अपने गुरु महाराज से भेंट
युवावस्था में उनकी भेंट श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुर से हुई, जिन्होंने पहली ही भेंट में उनसे श्री चैतन्य महाप्रभु की शिक्षाओं को बाहरी जगत तक ले जाने के लिए कहा। उन्होंने उसी क्षण उन्हें अपना गुरु स्वीकार कर लिया, और 1933 में इलाहाबाद में उन्हें विधिवत दीक्षा मिली।
1944कलकत्ता
बैक टू गॉडहेड
अपने गुरु महाराज के आदेश को छपे हुए शब्दों तक पहुँचाने के लिए उन्होंने बैक टू गॉडहेड नामक अंग्रेज़ी पत्रिका शुरू की, जिसे वे स्वयं लिखते और संपादित करते थे।
1959वृन्दावन
संन्यास आश्रम
17 सितंबर 1959 को उन्होंने संन्यास ग्रहण किया। वृन्दावन के राधा-दामोदर मंदिर में रहते हुए उन्होंने श्रीमद्भागवतम् का अंग्रेज़ी में अनुवाद आरंभ किया।
1965न्यूयॉर्क
सागर के पार
उनहत्तर वर्ष की आयु में वे मालवाहक जहाज़ जलदूत से अमेरिका गए और 17 सितंबर 1965 को न्यूयॉर्क के बंदरगाह पर पहुँचे।
1966न्यूयॉर्क
इस्कॉन की स्थापना
11 जुलाई 1966 को उन्होंने न्यूयॉर्क में अन्तरराष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ का पंजीकरण कराया। शुरुआत 26 सेकंड एवेन्यू की एक छोटी-सी दुकान से हुई।
1969लंदन
बरी प्लेस
उनके शिष्य 1968 में लंदन पहुँचे। श्रील प्रभुपाद सितंबर 1969 में आए, और उसी दिसंबर शहर के बीचों-बीच बरी प्लेस में राधा-कृष्ण मंदिर खुला।
1977वृन्दावन
उनका प्रस्थान
श्रील प्रभुपाद 14 नवंबर 1977 को 81 वर्ष की आयु में वृन्दावन में इस संसार से विदा हुए। उनके ग्रंथ, मंदिर और शिष्य उनके मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं।
“You should preach this Caitanya philosophy to the outside world.”
उनकी विरासत
- मंदिर, आश्रम और सांस्कृतिक केंद्र
- 100+
- कृष्ण परंपरा पर ग्रंथ
- 70+
- भाषाओं में उनके ग्रंथों का अनुवाद
- 76
- बार पृथ्वी की परिक्रमा करते हुए प्रवचन-यात्राएँ
- 14
आँकड़े: इस्कॉन शासी निकाय आयोग (GBC)

गुरु और शिष्य
श्रील प्रभुपाद और महाराज
1945 में बर्मिंघम में जन्मे महाराज ने बाथ एकेडमी ऑफ़ आर्ट में ललित कला की पढ़ाई की। जीवन के अर्थ की खोज उन्हें लंदन के नए इस्कॉन समुदाय तक ले गई, श्रील प्रभुपाद के पहले शिष्यों के वहाँ पहुँचने के कुछ ही वर्ष बाद।
1971 में उन्होंने श्रील प्रभुपाद से दीक्षा प्राप्त की और उसी वर्ष पूर्णकालिक मंदिर-भक्त बन गए।
इसके कुछ समय बाद वे बीबीटी लाइब्रेरी पार्टी से जुड़े और लगभग बीस महीनों तक भारत भर में यात्रा करके श्रील प्रभुपाद के ग्रंथ पुस्तकालयों, विश्वविद्यालयों और संस्थानों में पहुँचाए। 1977 में श्रील प्रभुपाद के प्रस्थान तक वे अपने गुरु महाराज के मिशन की सेवा करते रहे।
आज, स्वयं एक संन्यासी और आध्यात्मिक गुरु के रूप में, महाराज अपनी भूमिका को सरल रूप में देखते हैं: एक सेवक, जो दूसरों को श्रील प्रभुपाद तक पहुँचने में सहायता करता है।

अपने शिष्यों के साथ श्रील प्रभुपाद। चित्र: ISKCON Desire Tree
- 1945
- 1971
- 1984
- 1990
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प्रामाणिक जीवनी पढ़ें
सत्स्वरूप दास गोस्वामी द्वारा लिखित श्रील प्रभुपाद-लीलामृत प्रामाणिक जीवनी है। इसे 1978 में इस्कॉन के शासी निकाय आयोग (GBC) ने लिखवाया था, और यह श्रील प्रभुपाद के अपने सात हज़ार से अधिक पत्रों के आधार पर लिखी गई है। इसे ऑनलाइन निःशुल्क पढ़ा जा सकता है।